पाकिस्तान के कप्तान सरफराज अहमद ने मंगलवार को साउथ अफ्रीका के खिलाफ डरबन में खेले गए दूसरे वनडे मैच में ऐसी हरकत की जिसके बाद उन पर बैन लगाया जा सकता है. दरअसल, सरफराज अहमद ने साउथ अफ्रीका के बल्लेबाज एंडिल फेहलुकवायो के खिलाफ नस्लीय टिप्पणी की थी और उनकी मां के लिए गलत शब्दों का इस्तेमाल किया था.
हुआ हूं कि दक्षिण अफ्रीका की पारी के 37वें ओवर की तीसरी गेंद पर जब एंडिल फेहलुकवायो ने सिंगल लेकर दौड़ लगाई तो विकेट के पीछे पाकिस्तान के कप्तान सरफराज अहमद ने उन पर नस्लीय टिप्पणी की जो स्टंप माइक ने पकड़ लिया. वीडियो में सरफराज कह रहे हैं, ‘अबे काले! तेरी अम्मी आज कहां बैठी हैं?’ आईसीसी अगर सरफराज अहमद को नस्लीय टिप्पणी करने का दोषी पाती है तो उन पर कम से कम 4 टेस्ट या 8 वनडे मैचों का प्रतिबंध लग सकता है.
आपको बता दें कि दक्षिण अफ्रीका ने मंगलवार को डरबन में पाकिस्तान को दूसरे वनडे मैच में पांच विकेट से हराकर पांच मैचों की सीरीज में एक-एक बराबरी कर ली. रास्सी वान डेर डुसेन और एंडिले फेहलुकवायो की नाबाद अर्धशतकीय पारियों की मदद से मेजबान टीम ने पाकिस्तान को पांच विकेट से रौंद दिया.
निचले क्रम के बल्लेबाज हसन अली की 59 रनों की पारी से पाकिस्तान ने पहले बल्लेबाजी करते हुये 203 रन का स्कोर खड़ा किया था, जिसके जवाब में मेजबान टीम ने शीर्ष क्रम के लड़खड़ाने के बावजूद 42 ओवर में ही आसानी से 204 रनों के लक्ष्य को हासिल कर लिया और शानदार जीत के बदौलत सीरीज 1-1 से बराबर कर ली.
फिर 5 नवम्बर 1925 की बात है. देशबंधु चित्तरंजन दास का कोलकाता में निधन हुआ. सुभाष ने उनकी मृत्यु की खबर माण्डले जेल में रेडियो पर सुनी. माण्डले जेल में रहते समय सुभाष की तबीयत बहुत खराब हो गई. उनकी हालत बहुत खराब थी. लेकिन अंग्रेज़ सरकार ने फिर भी उन्हें रिहा करने से इनकार कर दिया. बाद में सरकार ने उन्हें रिहा करने की शर्त रखी कि वे इलाज के लिये यूरोप चले जाएं. लेकिन सरकार ने यह साफ नहीं किया कि इलाज के बाद वे भारत कब लौट सकते हैं.
इसलिए सुभाष ने यह शर्त नहीं मानी. आखिर में उनकी हालत बहुत बिगड़ गई. जेल अधिकारियों को लगा कि शायद वे कारावास में ही उनकी मौत न हो जाए. अंग्रेज़ सरकार यह खतरा भी नहीं उठाना चाहती थी. लिहाजा सरकार ने उन्हें रिहा कर दिया. इसके बाद सुभाष इलाज के लिये डलहौजी चले गए. लेकिन इसके कुछ दिन बाद ही उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया गया.
वर्ष 1930 में सुभाष जेल में बंद थे. लेकिन उन्होंने जेल से ही कोलकाता के मेयर का चुना लड़ा और वे जीत गए. इसलिए सरकार उन्हें रिहा करने पर मजबूर हो गई. 1932 में सुभाष को फिर से गिरफ्तार कर लिया गया. इस बार उन्हें अल्मोड़ा जेल में रखा गया. अल्मोड़ा जेल में उनकी तबीयत फिर से खराब होने लगी. इस बार नेताजी ने डॉक्टरों की सलाह मान ली और वे इलाज के लिये यूरोप जाने को राजी हो गए. इसके बाद वे यूरोप चले गए. वहां रहकर भी भारत की आजादी के लिए अपनी कोशिशों में लगे रहे. इस तरह से कुल मिलाकर उन्हें 11 बार जेल जाना पड़ा था.
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