साल 2014 में बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने 2014 के चुनावों से पहले एनडीए का पुनर्गठन करना शुरू किया था जो कि एक आसान काम नहीं था.
इससे पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने 1998 में एनडीए का गठन किया था. इसके बाद उनका बनाया हुआ गठबंधन 1998 से लेकर 2004 तक सत्ता में रहा.
लेकिन फिर एनडीए दस सालों के लिए सत्ता से बाहर हो गया. और एनडीए को बनाने वाले वाजपेयी भी राजनीति से संन्यास ले चुके थे.
ऐसे में 2014 में एनडीए के घटक दलों को एक छत के नीचे लाना एक जटिल काम था.
ऐसे में राजनाथ सिंह ने अपने भूले-बिसरे राजनीतिक साथियों को याद किया और ऐसे लोगों से भी हाथ मिलाए जो कि उनके पारंपरिक मित्रों में शामिल नहीं थे.
राजनाथ सिंह ने अपने अथक प्रयासों से जिस एनडीए का गठन किया वो उनके राजनीतिक गुरु अटल बिहारी वाजपेयी से भी बड़ा था.
ऐसे में कई लोगों ने राजनाथ सिंह को भविष्य के वाजपेयी के रूप में देखना शुरू कर दिया.
उल्लेखनीय बात ये है कि एनडीए के पुराने घटक दलों में से सिर्फ़ शिव सेना की विचारधारा ही बीजेपी से मेल खाती है.
इसके बाद भी जब-जब दोनों दलों के बीच किसी तरह की उठा-पटक होती थी तो वाजपेयी तत्कालीन शिव सेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे को फ़ोन करके बीच-बचाव करने की कोशिश करते थे.
साल 2014 में राजनाथ सिंह ने अटल बिहारी वाजपेयी की भूमिका को अदा किया. उन्होंने एनडीए के गठन में सामने आने वाली सभी रुकावटों को दूर कर दिया.
आज के दौर में अनुप्रिया पटेल नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में शामिल हैं. लेकिन इसके बावजूद 2019 के आम चुनाव में वह 'अपना दल' के लिए पर्याप्त सीटें हासिल करने में दुश्वारियों का सामना कर रही हैं.
इसके साथ ही एक दूसरे घटक दल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी की बीजेपी से नाराज़गी जगज़ाहिर है.
इस दल के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर योगी आदित्यनाथ की सरकार में मंत्री हैं.
इसके बाद भी वह अपनी ही सरकार और बीजेपी के नेतृत्व की आलोचना करने में कोताही नहीं बरतते हैं.
लेकिन अब तक बीजेपी नेतृत्व की ओर से उनकी समस्याओं के समाधान तलाशने की कोशिश नहीं की गई है.
राजनाथ सिंह की तरह संवाद स्थापित करने की जगह बीजेपी नेतृत्व अपने सहयोगी दलों को डराने-धमकाने के संकेत दे रहा है.
अब इसे घमंड कहें या बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का अति-आत्मविश्वास कि वह किसी तरह का समझौता करने और अपने सहयोगियों की मांगे मानने को तैयार नहीं दिख रहे हैं.
एनडीए के मतभेद
राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी का उदाहरण लीजिए. पासवान भी बीजेपी से दूरी बनाने के संकेत दे रहे थे. और इससे बुरी बात क्या होगी कि दोनों पार्टियों में मतभेदों की बात खुलकर सामने आ रही थी.
बीजेपी के एक सूत्र के मुताबिक़, "ऐसे समय में राजनाथ सिंह जैसा अनुभवी व्यक्ति आसानी से मीडिया में आ रहे मतभेदों को पर्दे के पीछे रख सकता था और बीजेपी नेतृत्व को शर्मसार होने से बचा सकता था."
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